दुधवा नेशनल पार्क
उत्तराखंड गठन के बाद उत्तर प्रदेश का पहला राष्ट्रीय उद्यान, जो साल वन, घासभूमि, बाघ, गैंडा, हाथी, बारहसिंगा, हिस्पिड हेयर और पक्षियों के लिए प्रसिद्ध है।
दुधवाराष्ट्रीय उद्यानबाघनेपाल सीमा पर उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा जिला, जहां दुधवा नेशनल पार्क, किशनपुर, गोला गोकर्णनाथ, मेंढक मंदिर, थारू शिल्प, नदियां और गन्ने का गुड़ प्रमुख हैं।
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लखीमपुर खीरी का इतिहास चंद्रवंश और महाभारत परंपरा, प्राचीन टीलों, समुद्रगुप्त के अश्वमेध घोड़े की स्मृति, राजपूत सीमांत बसाव, अवध और मोहम्मदी के 1857 विद्रोह से जुड़ा है। आधुनिक खीरी उत्तर प्रदेश का सबसे बड़ा जिला है, जो दुधवा नेशनल पार्क, किशनपुर अभयारण्य, थारू समुदाय, गन्ना-गुड़ अर्थव्यवस्था और तराई नदी परिदृश्य के लिए प्रसिद्ध है।
जिला इतिहास खीरी को चंद्रवंश परंपरा, महाभारत प्रसंगों, प्राचीन टीलों और समुद्रगुप्त के पत्थर के घोड़े के अभिलेख से जोड़ता है, जो अब लखनऊ संग्रहालय में है।
यह जिला क्षेत्र कठिन तराई सीमांत रहा। अकबर के समय यह अवध के खैराबाद सरकार का हिस्सा था, बाद में राजपूत, नवाबी और वन बसाव इतिहास जुड़ा।
जिला इतिहास के अनुसार 1857 के भारतीय विद्रोह में मोहम्मदी उत्तरी अवध के स्वतंत्रता संघर्ष का प्रमुख केंद्र बना।
1977 में दुधवा नेशनल पार्क घोषित हुआ और 1987 में दुधवा व किशनपुर मिलकर दुधवा टाइगर रिजर्व बने, जिससे खीरी उत्तर प्रदेश का मुख्य वन्यजीव पर्यटन जिला बना।
उत्तराखंड गठन के बाद उत्तर प्रदेश का पहला राष्ट्रीय उद्यान, जो साल वन, घासभूमि, बाघ, गैंडा, हाथी, बारहसिंगा, हिस्पिड हेयर और पक्षियों के लिए प्रसिद्ध है।
दुधवाराष्ट्रीय उद्यानबाघदुधवा से लगभग 30 किमी दूर शारदा नदी और साल वन के किनारे फैला वन्यजीव अभयारण्य, जो दुधवा के साथ मिलकर दुधवा टाइगर रिजर्व बना।
किशनपुरअभयारण्यशारदादुधवा, पलिया, मैलानी और किशनपुर के आसपास सफारी सर्किट, जो गाइडेड वन्यजीव दर्शन, वन जानकारी और तराई पारिस्थितिकी के लिए उपयोगी है।
सफारीदुधवातराईदुधवा की घासभूमियां एक-सींग गैंडा पुनर्वास, बारहसिंगा, हॉग डियर, घासभूमि पक्षियों और शीतकालीन वन्यजीव फोटोग्राफी के लिए महत्वपूर्ण हैं।
गैंडाबारहसिंगाघासभूमिलखीमपुर से 12 किमी दूर ओयल कस्बे का अनोखा शिव मंदिर, जो 1860-1870 के बीच मंडूक तंत्र अवधारणा, मेंढक रूप और कमल योजना पर बना।
मेंढक मंदिरओयलशिवगोला गोकर्णनाथ का प्रसिद्ध शिव मंदिर, जिसे छोटी काशी कहा जाता है और जो रावण व शिवलिंग परंपरा से जुड़ा है। चैत्र में बड़ा चेती मेला लगता है।
गोलाशिवछोटी काशीदेवकली शिव मंदिर जनमेजय, नाग यज्ञ और सांपों से रक्षा की स्थानीय आस्था से जुड़ा है, इसलिए यह खीरी का महत्वपूर्ण तीर्थ स्थल है।
देवकलीशिवनाग यज्ञलखीमपुर शहर का महत्वपूर्ण मंदिर, जो स्थानीय आस्था, बाजार और त्योहार मार्ग कवरेज के लिए उपयोगी है।
संकटा देवीमंदिरलखीमपुरपूर्व विलॉबी मेमोरियल हॉल, जिसे बाद में स्वतंत्रता सेनानी नसीरुद्दीन मौजी नगर के नाम पर रखा गया। यह औपनिवेशिक इतिहास और स्थानीय स्वतंत्रता स्मृति से जुड़ा है।
स्वतंत्रतास्मारकलखीमपुरलखीमपुर और खीरी के बीच रेलवे ट्रैक के पास ऐतिहासिक ईदगाह, जो वास्तुकला, ईद जमावड़े और स्थानीय सांस्कृतिक जीवन के लिए जाना जाता है।
ईदगाहखीरीविरासतशारदा और तराई सिंचाई प्रणाली से जुड़ा नदी और बैराज परिदृश्य, जो जिला पारिस्थितिकी और ग्रामीण मार्ग कवरेज के लिए उपयोगी है।
शारदानदीबैराजथारू समुदाय का ओडीओपी सूचीबद्ध जनजातीय शिल्प, जिसमें वस्त्र, पौध रेशा, कागज, कठोर और आकार देने योग्य सामग्री से बने हस्तनिर्मित उत्पाद शामिल हैं।
थारूजनजातीय शिल्पओडीओपीओडीओपी पेज जिले में पुराने गुड़ उत्पादन, 500 से अधिक सूक्ष्म क्रशर इकाइयों और मजबूत गन्ना अर्थव्यवस्था का उल्लेख करता है।
गुड़गन्नाओडीओपीदुधवा नेशनल पार्क, वन विश्राम गृह, सफारी आवाजाही और नेपाल सीमा व तराई वन मार्ग की पहुंच वाला प्रवेश कस्बा।
पलियादुधवाप्रवेशउत्तरी अवध के 1857 विद्रोह और मोहम्मदी को प्रमुख विद्रोह केंद्र बताने वाले जिला इतिहास से जुड़ा ऐतिहासिक कस्बा मार्ग।
मोहम्मदी1857स्वतंत्रताकोई स्थानीय खोज साझा करनी है? बेहतर गाइड बनाने में हमारे संपादकों की मदद करें।
छिपी हुई जगह सुझाएँ →खीरी के भोजन में गन्ने का गुड़, गुड़ की मिठाइयां, थारू शैली चावल और मछली भोजन, गोला मेले के स्नैक्स, पुराने शहर की कचौरी-चाट, वन विश्राम गृह भोजन और मौसमी ग्रामीण भोजन शामिल करें।
गन्ने से बनने वाली ओडीओपी मान्यता प्राप्त गुड़ पहचान, जिसकी स्थानीय और राज्य से बाहर मांग है।
थारू समुदाय क्षेत्रों के लिए सम्मानजनक भोजन कवरेज, जिसमें चावल, मछली, साग और मौसमी ग्रामीण सामग्री शामिल है।
छोटी काशी और चेती मेले के आसपास मंदिर मार्ग के स्नैक्स, प्रसाद, मिठाई, कचौरी और चाय।
शहर बाजार और मंदिर मार्गों के पास नाश्ता और शाम के स्नैक्स के लिए उपयोगी फूड ट्रेल।
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नवंबर से मार्च दुधवा, किशनपुर, बर्डिंग, मेंढक मंदिर, गोला गोकर्णनाथ और ग्रामीण बाजारों के लिए अच्छा समय है। अप्रैल से जून की शुरुआत गर्म रहती है, लेकिन सुबह की सफारी में वन्यजीव दिखने की संभावना रहती है।
तराई की बहुत गर्मी। दुधवा में सुबह वन्यजीव दर्शन अच्छे हो सकते हैं, लेकिन गर्मी सुरक्षा और सफारी समय जरूरी हैं।
भारी बारिश, जलभराव वाली घासभूमि और सफारी पहुंच बंद या सीमित रहती है। ग्रामीण रास्तों में अतिरिक्त समय लग सकता है।
दुधवा, किशनपुर, प्रवासी पक्षी, गोला मंदिर, मेंढक मंदिर और गुड़ बाजारों के लिए सबसे अच्छा मौसम।
लखनऊ और पलिया एयरपोर्ट नोट
लखीमपुर, गोला, मैलानी, पलिया और दुधवा रेल बेल्ट
लखनऊ, दिल्ली, गोला, पलिया और दुधवा मार्ग